मासूमों का चहकना लोगों को नए उत्साह से
भर देता है, लेकिन झारखंड जैसे नक्सल की मार झेल रहे प्रदेश में बच्चों की
तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है। जिस उम्र में बच्चे अपनी आजादी को पूरी
तरह से जीना चाहते हैं, उसी समय मानव तस्करों की काली नजर इनका बचपन छीन
लेती है। राज्य के कई जिले ऐसे हैं जहां बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियां
संगठित तस्करी का शिकार होती हैं। उन्हीं बच्चों की मुस्कान वापस लाने के
लिए रांची की एक संस्था पिछले 14 सालों से काम कर रही है। वर्ष 2012 से अभी
तक इस संस्था ने 543 बच्चों को मुक्त कराया है। अधिकांश बच्चे दिल्ली से
बरामद हुए हैं। यह संस्था बच्चों को बरामद करने के बाद उन्हें ट्रेनिंग
देती है और 18 वर्ष होने के बाद उन्हें रोजगार देती है।
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तस्करों से छुड़ा बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे
मासूमों का चहकना लोगों को नए उत्साह से
भर देता है, लेकिन झारखंड जैसे नक्सल की मार झेल रहे प्रदेश में बच्चों की
तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है। जिस उम्र में बच्चे अपनी आजादी को पूरी
तरह से जीना चाहते हैं, उसी समय मानव तस्करों की काली नजर इनका बचपन छीन
लेती है। राज्य के कई जिले ऐसे हैं जहां बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियां
संगठित तस्करी का शिकार होती हैं। उन्हीं बच्चों की मुस्कान वापस लाने के
लिए रांची की एक संस्था पिछले 14 सालों से काम कर रही है। वर्ष 2012 से अभी
तक इस संस्था ने 543 बच्चों को मुक्त कराया है। अधिकांश बच्चे दिल्ली से
बरामद हुए हैं। यह संस्था बच्चों को बरामद करने के बाद उन्हें ट्रेनिंग
देती है और 18 वर्ष होने के बाद उन्हें रोजगार देती है।एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग युनिट यानी हाथी के दांत!
रांचीः मानव तस्करी पर नियंत्रण के लिए जिला स्तर पर बनायी गयी एंटी
ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट एएचटीयु क्या हाथी दांत बनकर रह गयी है? झारखंड के
आठ जिलों में बने एएचटीयु में से कुछ को छोड़ दें तब बाकी की स्थिति कुछ
ऐसी ही है। चैंकाने वाली बात यह कि नियम कानून की पेचिदगियों के कारण 2015
में झारखंड में मानव तस्करी और गुमशुदगी से संबंधित केवल 152 मामले दर्ज
किये गये हैं और जिस एएचटीयु को इलाके में सक्रिय ट्रैफिकर्स का डेटा तैयार
करने की जिम्मेदारी दी गयी है तकनीकी खामियों के कारण वो इस काम को नहीं
कर पा रहा है। और तो और बच्चों को मुक्त कराने के लिए एएचटीयु की जो टीम
दूसरे राज्यों में जाती है उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं होते इसलिए उनमें
ऐसी कार्रवाई के दौरान रूचि का भी अभाव दिखता है। यह बात एएचटीयु से जुड़े
कुछ अधिकारियों और मानव तस्करी पर काम कर रहे स्वयंसेवी संस्थाओं से बात
करने के बाद सामने आयी है। इन सवालों का जवाब ढूंढ़ते हुए न्यूज विंग ने जब
पड़ताल शुरू की तब कई तथ्य सामने आये।
सबसे पहले यूनिट के हाथी का
दांत होने की बात को हाल की एक घटना से इसे समझने की कोशिश करते हैं। रांची
के बुंडू प्रखंड में किसी परिवार का बच्चा गुम हो जाता है। इस परिवार को
थाने में शिकायत करने के लिए बुंडू नहीं, वहां से 33 किलोमीटर दूर रांची
में बने एएचटीयु आना पड़ेगा क्योंकि एएचटीयु योजना में जिला स्तर पर इसे
स्थापित करने का प्रावधान किया गया है। इसी युनिट में बच्चे के गुमशुदा
हाने की शिकायत दर्ज की जायेगी। तब जाकर इस मामले की जांच के लिए बुंडू
थाना के ही पुलिसकर्मी जांच अधिकारी बनाये जायेंगे। उसके बाद ही इस मामले
की जांच शुरू होगी। अब इस घुमावदार रास्ते की परेशानियों से बचने के लिए
बच्चों या किसी महिला के गुमशुदा हो जाने की स्थिति में ग्रामीण प्राथमिकी
दर्ज कराने के झंझट से बचना चाहते हैं। परिणाम स्वरूप मानव तस्करी या
बच्चों के लापता होने के अधिकांश मामले दर्ज नहीं किये जा रहे हैं और
आंकड़ों में अंतर भी दिखता है।
तस्करी की मंडी में गरीब आदिवासि मासूम
देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है
-राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं
- लापता बच्चों में करीब 11,000 का ही पता लग पाता है
यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है
-देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है
- देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है
हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती है। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब .आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है।
Revised Integrated Child Protection Scheme (ICPS)
The Government of India – Ministry of
Women and Child announced the new revised guidelines for the
Integrated
Child Protection Scheme (ICPS). This announcement strengthens India’s
Commitment on Child Rights
‘Child Protection’ is about protecting
children from or against any perceived or real danger or risk to their
life, their personhood and childhood. It is about reducing their
vulnerability to any kind of harm and protecting them in harmful
situations. It is about ensuring that no child falls out of the social
security and safety net and, those who do, receive necessary care,
protection and support so as to bring them back into the safety net.
While protection is a right of every child, some children are more
vulnerable than others and need special attention. The Government
recognizes these children as ‘children in difficult circumstances’,
characterized by their specific social, economic and geo-political
situations. In addition to providing a safe environment for these
children, it is imperative to ensure that all other children also remain
protected. This is because Child protection is integrally linked to
every other right of the child.
Failure to ensure children’s right to
protection adversely affects all other rights of the child. Thus, the
Millennium Development Goals (MDGs) cannot be achieved unless child
protection is an integral part of programs, strategies and plans for
their achievement. Failure to protect children from issues such as
violence in schools, child labour, harmful traditional practices, child
marriage, child abuse, the absence of parental care and commercial
sexual exploitation among others, means failure in fulfilling both the
Constitutional and International commitments towards children
Fast-track recording of rape victims’ statements: Supreme Court
![]()
Giving a series of directions, a Bench of Justices Gyan Sudha Mishra (since retired) and V. Gopala Gowda said “upon receipt of information relating to the commission of offence of rape, the Investigating Officer shall make immediate steps to take the victim to any Metropolitan/preferably Lady Judicial Magistrate for the purpose of recording her statement under Section 164 Cr.P.C.”
The bench emphasised that the recording of evidence of the victim and other witnesses multiple times ought to be put to an end which was the primary reason for delay of the trial. It said “We are of the view that it is high time such measures of reform in the Cr. P.C. be introduced after deliberation and debate by the legal fraternity.”
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लड़कियों के तस्कर ने दिल्ली में की थी व्यवसायी की हत्या
रांची : वह झारखंड की मासूम बेटियों का सौदा करता था। वह उन्हें दिल्ली
ले जाता था और उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाता था। मानव व्यापार में जब
उसकी पोल खुली तो वह रांची में पकड़ा गया था। कोर्ट में गवाही नहीं होने से
रांची के होटवार स्थित सेंट्रल जेल छूट गया। इसके बाद दिल्ली में एक
व्यवसायी की हत्या कर दी। दिल्ली पुलिस ने उसे हत्या के जुर्म में गिरफ्तार
कर जेल भेज दिया है। जेल जाने वाला आरोपी 38 साल का रवींद्र कुमार राठी
उर्फ आकाश राठी मूल रूप से हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ सदर थाना
क्षेत्र के भपरोदा गांव का रहने वाला है।
जेल जाने वाले रवींद्र पर इस बार दिल्ली के राजौरी गार्डेन निवासी एक
व्यवसायी जितेंद्र लांबा की हत्या का आरोप लगा है, जिसमें उसकी गिरफ्तारी
हुई है। उसने वर्ष 2003 में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से स्नातक किया था।
वर्ष 2000 में वाहनों की खरीद-बिक्री में एजेंट का काम करता था। वर्ष 2002
में उसने शादी की थी। उसे तीन बच्चे भी हुए। उसके बाद उसने पुन: एक दूसरी
महिला से शादी की और उसके साथ नागलोई में किराए पर रहने लगा। रवींद्र ने
नांगलोई में गुडविल प्लेसमेंट एजेंसी शुरू की और घरेलू कार्यो के लिए
झारखंड की मासूम बच्चियों का सौदा करना शुरू किया।
जगन्नाथपुर थाने से भेजा गया था जेल
रांची के जगन्नाथपुर थाने से 28 जुलाई 2011 को मानव व्यापार के केस में
पहली बार रवींद्र कुमार राठी उर्फ आकाश राठी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।
उसके खिलाफ हरियाणा के झज्जर में दो कांड, दिल्ली के निहाल विहार थाने में
आर्म्स एक्ट और जगन्नाथपुर थाने में आर्म्स एक्ट से संबंधित मामला दर्ज
है।
मानव तस्करी के जाल में फंसती आदिवासी युवतियां
अनीता की उम्र महज 14 साल है. सिर से पिता
का साया कब उठा, याद नहीं. सितंबर महीने में कथित मानव तस्कर इस आदिवासी
बाला को बहला-फुसला कर दिल्ली ले गए थे. दीया सेवा नामक ग़ैर सरकारी संस्था
ने दुश्वारियों से बचा तो लिया, लेकिन भविष्य क्या होगा,
इस मासूम को नहीं पता. उन्हें तो बस इतना भर पता है कि दूसरे के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करेंगी तो ख़ुद का, बूढ़ी-लाचार माँ बिरंग होरो और तीन छोटे भाई-बहनों का पेट भरेगा.
हम उनके गाँव गए तो पता चला कि गाँव से दूर एक खेत में वो काम करने गई हैं.
पगडंडियों से चलते हम उस खेत तक पहुंचे, जहाँ अनीता (बदला हुआ नाम) खेत में मजदूरी कर रही थीं.
दर्द भरी कहान
इस मासूम को नहीं पता. उन्हें तो बस इतना भर पता है कि दूसरे के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करेंगी तो ख़ुद का, बूढ़ी-लाचार माँ बिरंग होरो और तीन छोटे भाई-बहनों का पेट भरेगा.
हम उनके गाँव गए तो पता चला कि गाँव से दूर एक खेत में वो काम करने गई हैं.
पगडंडियों से चलते हम उस खेत तक पहुंचे, जहाँ अनीता (बदला हुआ नाम) खेत में मजदूरी कर रही थीं.
दर्द भरी कहान
अनीता की उम्र महज 14 साल है. सिर से पिता
का साया कब उठा, याद नहीं. सितंबर महीने में कथित मानव तस्कर इस आदिवासी
बाला को बहला-फुसला कर दिल्ली ले गए थे. दीया सेवा नामक ग़ैर सरकारी संस्था
ने दुश्वारियों से बचा तो लिया, लेकिन भविष्य क्या होगा, इस मासूम को नहीं
पता.
बच्चा गुमशुदगी का केस दर्ज नहीं करती पुलिस
मानव
तस्करी झारखंड के लिए एक अभिशाप है। हर साल लाखों की तादाद में झारखंड के
महिला और बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार होते हैं, लेकिन झारखंड पुलिस
टै्रफिकिंग पर कितनी गंभीर हैं, इसका अंदाजा पुलिस द्वारा बच्चों की
ट्रैफिकिंग पर दिये गये आंकड़ों से लगाया जा सकता है। अप्रैल 2012 से 15
जुलाई 2013 तक पूरे राज्य से 230 बच्चे लापता हैं। इनमें से पुलिस ने मात्र
10 मामलों में ही प्राथमिकी दर्ज की है। शेष मामलों में पुलिस सनहा दर्ज
किये हुए है।
बाल अधिकार कार्यकर्ता शेषनाथ वर्णवाल द्वारा मांगे गये सूचना के अधिकार के जवाब में डीजीपी कार्यालय के जवाब में यह आंकड़े मिले हैं। आंकड़ो के हिसाब से लापता बच्चों के सबसे अधिक मामले में पूर्वी सिंहभूम से 33 आवेदन मिले। इनमें से पुलिस ने एक भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की। गढ़वा, लोहरदगा और गिरिडीह में भी 25 -25 मामले आये। इनमें से मात्र लोहरदगा के एक मामले में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की।
कोर्ट के आदेशों की अवहेलना
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत सरकार के मामले में बच्चों की गुमशुदगी के प्रत्येक मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था। विडंबना है कि झारखंड में कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं हो रहा।
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत सरकार के मामले में बच्चों की गुमशुदगी के प्रत्येक मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था। विडंबना है कि झारखंड में कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं हो रहा।
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